सूतल रहलीं
सपन एक देखलीं
सपन मनभावन हो सखिया।
फूटलि किरनिया
पुरुब असमनवा
उजर घर-आंगन हो सखिया।
अखिया के नीरवा
भइल खेत सोनवात
खेत भइलें आपन हो सखिया।
गोसयां के लठिया
मुरइया अस तोरलीं
भगवलीं महाजन हो सखिया।
केहू नाहीं ऊंच-नीच
केहू का ना भय
नाहीं केहू बा भयावन हो सखिया।
बइरी पइसवा केरजवा मेटवलीं
मिलल मोर साजन हो सखिया।
-गोरख पांडे
3/28/09
पूरबिहा ब्लाग में आप लोगन क स्वागत बा
ब्लागिंग में शुरुआत कय देहलीं। ब्लाग बन गइल। अब देखीं केतना लिख पावेलीं। आप सब पूरबिहा लोगन के प्रनाम। गाइड करत रहीं। कउनो गलती होई त माफ करब। परनाम।
दीपक सिंह
दीपक सिंह
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